लफ्ज़ ए कश्मीर : प्राची पांडेय

नई दिल्ली ( प्राची पांडेय ) : लफ्ज़ ए कश्मीर सुनते ही ज़ेहन में एक बड़ी खूबसूरत सी तस्वीर उभर आती है . जिस्म के ठंडक का एहसास होता है ..और दिल कश्मीर की उन वादियों के तस्सवुर में खो जाता है . वो दरख्तों के झुरमुट  से ताकती धुप, वो सफ़ेद रेशम के दुपट्टे से लहराते बादल .पेड़ों पर लटकते जेवरात से कश्मीरी सेब वो नजाकत से सरकता झील का पानी , कुदरत ने बड़े हुस्न ओ जमाल से नवाज़ा है कश्मीर को मगर कहते हैं न हर किसी को मुकम्मत जहाँ नहीं मिलता , ख़ूबसूरती मिली तो मिली मगर उपर वाले ने तकदीर ए कश्मीर स्याह कलम से लिख दी, आइये बताते हैं
.कश्मीर बचपन से ही बेहद खूबसूरत थी , मोहल्ले भर के सारे बच्चों में सबसे प्यारी …सेब से लाल गाल , बर्फ सी सफ़ेद रंगत , जैसे कोई गुड़िया  हो .सब उसे अपने घर बुलाना चाहते थे , १९४७ का दौर था आजादी का दौर …उस वक़्त उसके पिता उसे कहीं जाने नहीं देना चाहते थे …वो चाहते थे की वो घर में ही रहे आज़ाद और आबाद , कश्मीर खुद भी मस्त मौला थी वो भी  खुद में खुश रहने वाली … बड़ी रूहानी थी वो….. पर आबाद रहना कहाँ  उसकी किस्मत में था , वो न अपने घर में महफूज़ थी न ही बाहर…..आइये आपको तारीख के गलियारों में ले चलते हैं .वहां  से कश्मीर की जिंदगी की झलक मिलतीहै  –
1947-वो दौर था हिंदुस्तान के आज़ादी का …सभी रियासतों को ये चयन करना था की वो हिन्दुस्तान के साथ रहना चाहते हैं या पकिस्तान के साथ ……कश्मीर के राजा उस वक़्त हरि सिंह हुआ करते थे ….उन्होंने कश्मीर को आज़ाद रखने की मांग की ,हालांकि पाकिस्तान को उम्मीद थी कश्मीर में मुसलमान ज्यादा हैं तो कश्मीर पकिस्तान में शामिल हो जाएगा पर ऐसा मुमकिन  न हो पाने पर पकिस्तान ने कश्मीर पर आक्रमण किया……..हर तरफ तबाही का मंज़र  देख कर वहां के राजा हरी सिंह ने भारत से मदद मांगी ,भारत नें राजा के आगे जम्मू-कश्मीर को भारत में  मिलाने की बात कही  महाराजा हरिसिंह ने भारतीय सरकार के साथ एक समझौता किया जिसके तहत भारत सरकार से सैन्य सहायता मांगी गई जिसके बाद भारतीय सेना ने आक्रमणकारियों  को परास्त कर दिया कहलाया। इसी बीच आज़ाद भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेंहरू ने इस मामले को लेकन यूएन गए और एक मध्य फैसला  सुनाने की दरख्वास्त की है …उस वक़्त युएन से सबसे पहले इस युद्ध को समाप्त करने की बात कही ..। हालांकि युएन की युद्ध समाप्ती की बात के अलावा एक और  बात कही …युएन ने पकिस्तान को कश्मीर से अपने सेना, आक्रमणकारियों ,और पाकिस्तानी लोगो को वापस जाने के लिए कहा और हिन्दुस्तान से अपनी सेना वापस बुला लेने को कहा ..लेकिन इस पर अमल नहीं हुआ उसके बाद कश्मीर 2 हिस्सों में बंट गया।
कश्मीर का जो हिस्सा भारत से लगा हुआ था,वह जम्मू-कश्मीर नाम से भारत का एक सूबा हो गया, वहीं कश्मीर का जो हिस्सा पाकिस्तान और अफगानिस्तान से सटा हुआ था, वह पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर कहलाया जाने लगा | जानकारी के लिए यह भी बता दें की केवल पकिस्तान नें ही नहीं चीन ने भी कश्मीर के थोड़े हिस्से पर कब्ज़ा किया है जिसे अक्साई चीन कहते हैं…और दोनों के बीच एल ऐ सी {लाइन ऑफ़ एक्चुअल कण्ट्रोल} भी है …..कश्मीर के मुद्दे को एक नज़रिए से देख कर कभी नहीं समझा जा सकता है …इसे देखने के लिए
बहु दृष्टिकोण का होना आवश्यक है और निष्पक्षता भी …कश्मीर का मुद्दा यु तो राजनीति में हमेशा से गर्म रहा हैं मगर आम लोगों के बीच ये १९९० के दंगे  के बाद  तूल पकड़ा- १९९०  की एक झलक -मस्जिदों से आती एक आवाज़ ने कश्मीरी पंडितों की झकझोर कर रख दिया ….ए जालिमों कश्मीर छोड़ो ,कश्मीर बनेगा पाकिस्तान  …ऐसे नारे उठे ये नारे नहीं फरमान थे ,मौत का फरमान ,हिजबुल मुजह्हिदीन का फरमान ,  रात के सन्नाटे में पसरे आतंक  के खौफ से पूरा कश्मीर थर्रा उठा था …  अलगाववादियों का और आतंकियों का एक हुजूम उतर आया था ….हाथों में बंदूके लहराई जा रही थी …धर्म को मोहरा बना कर कश्मीर को पकिस्तान बनाने का ये मंज़र इस्लाम और इंसानियत की सारी रवायतें तोड़ चूका था … आतंकी खुद को जिहादी बताते थे जिन्हें जिहाद का इल्म तक नहीं था …..मासूमों का नरसंहार ,बलात्कार ,आगजनी ,और चीत्कार से पूरी घाटी गूँज उठी थी ,
इस रात जितने लोग भाग पाए भागे उसके बाद शुरू हुआ हिंसा का वो दौर जिसे देख कर सहिष्णुता की आँखें पथरा गयी ….संवेदनाओं के साथ बलात्कार किया गया क्रूरता के हथियार और पैने होते गए और मानवता का संहार होता रहा …………कैसी विडंबना थी नाम लिया गया अल्लाह का मगर मारे भी अल्लाह के बन्दे ही गए ..!! खैर , इसके बाद हज़ारों की संख्या में कश्मीरी पंडितों का विस्थापन होना शुरू हो गया …..उन्हें अपना देश अपना घर छोड़ कर शिविरों में रहना पड़ा ………..खैर  इसके बाद हालत थोड़े ठीक हुए …सरकारें बदली ,नयी सरकार का गठन हुआ …….धीरे धीरे घाटी में माहौल शांत हुआ ………मगर बावजूद इसके इस त्रासदी ने इंसानियत को लहुलुहान कर दिया| इस त्रासदी में पकिस्तान के हिजबुल मुजाह्हिदीन और कश्मीर के अलगाववादी पार्टी जेकेएलएफ का बड़ा हाथ रहा है …….इस नफरत की आंधी  में कुछ मुस्लिम परिवार अपवाद भी हैं  जिन्होंने अपनी कश्मीरियत नहीं छोड़ी ….इस तूफ़ान में भी उन्होंने भाईचारे को दरख्त को गिरने नहीं दिया और कश्मीरी पंडितों को अपने घरों में महफूज़ रहने दिया | अब इसे एक दुसरे दृष्टिकोण से देखा जाए ….तो जो अलगाववादी युवक हैं जो बुरहान वानी जैसे आतंकी को अपना आदर्श मान लेते हैं  ………और खुद बुरहान जैसे युवक जो बचपन में सही गयी ज्यादतियों से तंग आकर आतंक की ओर चले जाते हैं वो दरअसल पकिस्तान की चालाकी का शिकार बनते हैं आर्मी का अंकुश उन्हें अपने राह में रोड़ा लगता है वो एक आज़ाद कश्मीर की मांग करते हैं …..कहीं न कहीं इसका ज़िम्मेदार कश्मीर के विपरीत हालात भी हैं जो इनके मानसपटल पर एक छाप छोड़ जाते हैं …..आप ही सोचिए आप अगर रोज़ ही बम बारूद और गोलियों की की आवाजें सुनेंगे तो क्या आप एक सामान्य जीवन जी सकेंगे,
ये सच है की AFPA कश्मीर में सुरक्षा के नज़रिए से ज़रूरी है ..पर ग्राउंड जीरो की रिपोर्ट्स के अनुसार इसके तहत  कई बार मासूम लोग भी शक का शिकार हो जाते हैं ….. मारे जाते हैं ..उनका कुसूर सिर्फ इतना है की वो कश्मीर में रहते हैं  …….और ये ज़ख्म धीरे धीरे नासूर बनता जा रहा है …..जिन्होंने अपनों को निर्दोष हो कर भी मरते देखा …वो अलग होना चाहते हैं भारत से ….और पकिस्तान अपने मंसूबों में कामयाब नज़र आता है …युवाओं को भड़काने में वह कोई कसर नहीं छोड़ता….और पूरे कश्मीर को हासिल करना चाहता है….. कोई भी राजनीतिक पार्टी हो….हर पार्टी ने जलते कश्मीर की आग में अपनी सियासी रोटियां सेंकी  हैं ….न कश्मीर को आबाद किया ना ही उन विस्थापित पंडितों के लिए कुछ ख़ास किया गया .. ..वो पंडित जो 19 जनवरी 1990 की रात चले गए थे उन्हें घर वापसी के लिए प्रलोभन तो दिएगए पर ग्राउंड जीरो पर ये कारगर साबित नहीं हुए
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.कश्मीर आज भी उन वादियों में अकेली  खड़ी  है उसी माकन में जो चारों ओर से ढह चूका है …दीवारें जर ज़र हो चुकी हैं ….उस आँगन में सन्नाटा पसरा हुआ है …जिसमें कभी पायलों की छन छन ,सील बट्टे की ख़त पट …सुनाई पड़ती थी….कश्मीर के ना माँ बाप रहे न रिश्तेदार न पडोसी …….अब उसे कोई अपने घर नहीं बुलाता ….सब उसे अकेला छोड़ देते हैं ….उन्ही काली खौफनाक यादों के दरमियाँ वो सिसकती रहती हैं  …..उसके साथ हज़ारों बलात्कार हुए हैं ….. जिस्म पर लाखों ज़ख्म के निशान है ..उसने कानून के दरवाजे भी खटखटाए  थे.. नेताओं से भी अपनी व्यथा सुनई थी ….पर  हासिल कुछ भी न हुआ .
कश्मीर अब बूढी हो चली है. चमड़ी लटकाने लगी है विस्फोटों के धुयें से आँखों की रौशनी चली गयी …कान भी सुन्न हो चुके हैं ……वो ठंड में अक्सर शाम को अपने दुआरे पर बैठ कर याद करती है वो बचपन …जब वो खेलते खेलते अमीना चाची के घर जाती थी और चाचिजान कितने प्यार से उसे कवाब खिलाती थी ….और फिर शम्भू मामा के काँधे पर बैठ कर ठंडाई वाला दूध पीने जाती थी ..आआहह ……..क्या लज्ज़त त थी जिंदगी में क्या दिन थे वो …..कहाँ खो गयी  वो कश्मीरियत ….कहाँ चले वो लोग …..कश्मीर अक्सर सोचती की शायद उसकी आजादी की इक्षा ही उसकी बर्बादी का सबब है ….? खैर ……जुल्म ओ सितम के वो मंज़र देखने के बाद धुंधलाई  इन आँखों का अब पथरा जाने का इंतज़ार है

Post Author: KUKU

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